मन का पागलपन

मन के पागलपन को देखो चंचल है यह नादां ऐसे

मंदिर में पूजा में बैठा, बुनता है यह सपने कैसे

महल बने इक सुंदर मेरा, धन दौलत इतनी मिल जाए

मेरी जीवन-बगिया महके, हर पल फूलों से खिल जाए

शोहरत इज़्ज़त, मान का धन भी, मिले मुझीको ज़्यादा सबसे

छोटी सी यह आस लिए मैं, द्वार पे तेरे पर खड़ा हूँ कब से

साथ ना छोड़े कभी जवानी, रूप ये मेरा रहे सदा ही

हाथ वक़्त का ना मुझ तक पहुचे, दो ऐसा वरदान खुदाई

छोटी सी इक और अर्ज़ है, तेरे दर पे आया हूँ जो

सुख ही में बस हर पल गुज़रे,प्रभु मेरे कुछ ऐसा कर दो

सुख दुःख का मैं रिश्ता समझूँ, पर जानू मैं तेरा भी बल

दुःख की धूप हटा दो सारी, सुख की छाया कर दो हर पल

माँग-माँग के थक गया जब तो, सोच नई ने आकर घेरा

इस नागरी में चाहूं भी तो, सदा नहीं है मेरा बसेरा

और नयी उलझन ने घेरा, मैं हूँ कौन,कहाँ है जाना,

यह दुनिया मिल जाए भी तो ,बाद यहाँ के क्या है पाना

“मैं” मुझको जो समझ रहा हूँ, अब लगता है धोखा ही था

बदल रहा है जो पल पल मे, बदलने वाला “मैं” तो नही था

मन भी “मेरा मन” है गर तो, फिर यह “मन” भी “मैं” तो नहीं हूँ

शायद काया मिटने वाली,उसके भीतर यहीं कहीं हूँ

इस माटी के पुतले में ही, कहीं छुपा है मेरा भगवन

भगवन के बस बीच हृदय मे, मिलेगा तुमको “चंचल सा मन”

गर इस मन को बस मे कर लूँ, “परम आत्मा” मिल जाएगी

चंचल मन की कोमलता फिर ,दया से उसके खिल जाएगी

— डा. रानी कुमार

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