अडालज की वाव

हमारा पहला पड़ाव था “अडालज की वाव” ।  वाव या बावड़ी या, अंग्रेज़ी में, Stepwell, का इतिहास बहुत पुराना है ।  पानी को संचय करनेवाली यह संरचनाएँ सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेषों में भी पाई गई हैं ।  भारत में करीब उन्नीसवीं सदी तक जल संग्रह के लिए बावड़ियों का निर्माण होता रहा ।  वाव में पानी का संग्रह जमीन में गहराई मे किया जाता है, जहां बरसात के अलावा आस-पास की जमीन का पानी भी जमा हो जाता है और गहराई में होने के कारण पानी गर्मी से भाप बन कर नहीं उड़ जाता ।  गहराई में पानी तक पहुँचने के लिए पत्थर काट कर सीढ़ीदार ढांचा बनाया जाता है । (वाव रचना के विस्तृत वर्णन के लिए यहाँ क्लिक करें )

अडालज, अहमदाबाद के उत्तर की तरफ करीब २०-२२ किलोमीटर की दूरी पर है ।  शहर के बीच से निकलने समय थोड़ा ज्यादा (४५ – ५० मिनट) लगता है ।  हम लोग बोडकदेव से निकले थे तो सरखेज – गांधीनगर हाइवे से हो कर निकले तो करीब आधे घंटे में अडालज पहुँच गए । 

मैं काफी समय बाद अहमदाबाद आया था ।  इसके विकास और विस्तार के बारे में काफी कुछ सुना था ।  फिर भी हाइवे और शहरों की सड़कों के नेटवर्क, सड़कों की अच्छी अवस्था देख कर मैं काफी प्रभावित हुआ । 

रास्ते मे नई बनती इमारतों को देख कर अहमदाबाद और गुजरात के विकास के बार में सुनी हुई खबरों पर विश्वास होने लगता है ।  यह तो जरूर है कि गुजरात की उन्नति की कहानी को झुठलाया नहीं जा सकता ।

अडालज की वाव का प्रांगण, हाइवे से निकल कर ज्यादा दूर नहीं है ।  वाव और उसके साथ का बगीचा, एक त्रिकोण के आकार का हरा-भरा क्षेत्र है और पास ही में अडालज झील है ।  वाव मे कुछ पानी झील के पानी के रिसाव से आता है ।  ऊपर के दूसरे चित्र में पानी के कुंड की स्थिति लाल वृत्त से दर्शाई गई है । वहाँ तक पहुँचने के लिए वाव की लंबाई मे सीढ़ियाँ बनी हुई हैं ।

Images: Courtesy of Google Maps

अडालज की वाव का प्रांगण हाइवे से निकल कर ज्यादा दूर नहीं है ।  वाव और उसके साथ का बगीचा एक त्रिकोण के आकार का हरा-भरा क्षेत्र है और पास ही में अडालज झील है ।  वाव मे कुछ पानी झील के पानी के रिसाव से आता है ।  ऊपर के दूसरे चित्र में पानी के कुंड की स्थिति लाल वृत्त से दर्शाई गई है । वहाँ तक पहुँचने के लिए वाव की लंबाई मे सीढ़ियाँ बनी हुई हैं ।

इस वाव के निर्माण का श्रेय वाघेला वंश के राजा वीर सिंह को जाता है जिन्होंने इस सूखाग्रस्त इलाके में प्रजा को पानी उपलब्ध कराने के लिये इस वाव का निर्माण शुरू कराया था ।  दुर्भाग्य से, इस निर्माण के दौरान ही, राजा वीर सिंह, गुजरात के तत्कालीन राजा महमूद बेगड़ा के साथ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए ।  विजयी महमूद बेगड़ा ने राजा वीर सिंह की विधवा रानी रुदाबाई के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा ।  रानी एक शर्त पर इसके लिए राजी हो गईं कि महमूद बेगड़ा इस वाव का निर्माण कार्य पूरा करेंगे ।  महमूद बेगड़ा इसके लिए राजी हो गया और इस ५ स्तरीय वाव का कार्य चलता रहा ।  वाव का निर्माण पूरा होते ही रानी रुदाबाई ने महमूद बेगड़ा से विवाह के बजाय इस वाव की गहराई में कूद कर अपना जीवन समाप्त करना ज्यादह मुनासिब समझा ।

एक और दुःखद किंवदंती के अनुसार, वाव निर्माण के बाद महमूद बेगड़ा ने, जिन छः कारीगरों ने इसे तराशा था, उनको मार कर उनको वाव के पास ही छः कब्रों मे दफना दिया जिससे कि इस वाव के जैसी भव्य प्रतिकृति और कोई न बन सके ।

बावड़ी में लगे एक संस्कृत शिलालेख के अनुसार, बावड़ी का निर्माण कार्य सम्पन्न हो जाने पर इस का समर्पण संवत १५५५ (ईस्वी सदी १४९८) के माघ मास (जनवरी/फरवरी) के शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन, बुधवार को सम्पन्न हुआ ।  इसकी लागत, उस समय की मुद्रा में करीब ५ लाख थी ।

अडालज की वाव पाँच मंजिली है और इसमे पानी का कुंड, जमीनी स्तर से करीब २० मी. नीचे है ।  यहाँ तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ, दक्षिण की ओर से, करीब ४० मी. की दूरी से शुरू होती हैं ।  जहां से सीढ़ियाँ शुरू होती हैं वहाँ तक पहुँचने के तीन रास्ते हैं — पूर्व, पश्चिम और दक्षिण से ।  वाव संरचना की पूरी लंबाई करीब ७५ मी. है ।

हर एक मंजिल को खंभों के ढांचों के सहारे खड़ा किया गया है ।  सीढ़ियाँ एक अष्टभुजाकारी कुंड पर समाप्त होती हैं ।  यह अष्टभुज एक ९ मी x ९ मी चतुर्भुज के ऊपर बनाया गया है और अष्टभुज के ८ और चतुर्भुज के ४, १२ कोनों पर बने खंभे ऊपर की संरचना को सहारा दे ते हैं ।  कुंड की संरचना ऐसी है की यहाँ से खुला आकाश दिखाई देता है और यहाँ, जमीन के पाँच मंजिल नीचे भी खुली हवा और पर्याप्त प्रकाश रहता है । जमीन के स्तर पर, कुंड के पास ही गोलाकार सीढ़ियाँ भी हैं जो चौथे स्तर (कुंड से एक स्तर ऊपर) तक जाती हैं ।  सीढ़ियों तक जाने का रास्ता जमीन के स्तर पर जाली से बंद कर रखा है ।

यहाँ की सारी संरचना करीब पाँच सौ साल पुरानी है और बालुई पत्थरों (Sand stone) से की हुई है ।  यह अपने आप में एक अद्भुत उपलब्धि है, लेकिन इन पत्थरों पर जो अद्भुत नक्काशी की है वह इस संरचना पर चार चाँद लगा देती है ।  हर एक पत्थर पर कुछ न कुछ विशिष्ट नक्काशी की हुई है ।  नक्काशी सोलंकी वास्तु-कला, जो अपनी जटिलता और विस्तृतता के लिए जानी जाती है, से प्रभावित है जिसमे कुछ प्रभाव मुस्लिम वास्तु-कला का भी दिखता है ।  नक्काशी में हिन्दू और जैन प्रतीक भी दिखाई देते हैं ।

मंडला

केंद्र में कमल — ब्रह्मांडीय व्यवस्था, आध्यात्मिक जागृति या दिव्य ऊर्जा का प्रतीक

ज्यामितीय प्रतिरूपों और फूलों की नकाशी से सजे स्तम्भ

आधार में समृद्धि और दिव्य उपस्थिति के प्रतीक

जमीन के स्तर से कुंड की ओर नीचे जाती हुई सीधी सीढ़ियाँ

कुंड के पास चौथे स्तर तक जाती घुमावदार सीढ़ियाँ

आले की खिड़की के चारों ओर की नक्काशी

कुंड और उसको घेरे हुए

अष्ट-भुजीय ढाँचा

पानी का कुंड — जमीन के स्तर पर

तीसरे से पांचवें स्तर का स्ट्रक्चर

दरवाजों के ऊपर की गई नक्काशी का एक नमूना

नक्काशी के कुछ और नमूने

— विनोद बाँठिया

Image Credit: https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Map_Gujarat_state_and_districts.png

Photographs: Members of Banthia Family

Maps: © Google

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