इन्सान की दौड़

इन्सान की दौड़

प्रकृति, देख रही है इन्सान को,
उसकी दौड़ती भागती जिंदगी को

उसे है गंतव्य तक पहुंचने की दौड़
ट्रैफिक से बचने की होड़
मन में दबाव, तनाव और बेचैनी
जरा ठहर कर,रुक कर देखने की फुर्सत भी नहीं है
इन्सान को ये क्या हो गया है?

सूर्य की लालिमा तो आज भी है
पक्षियों ने तो अपने कलरव से
सुबह का स्वागत आज भी किया है
कोयल तो अभी भी कूक रही है,
फूल अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं
खिलकर मुस्कुराहट फैला रहे हैं
बादल आज भी आंख मिचौली खेल रहे हैं

पर इन्सान बेचारा

दौड़ रहा है रोजी-रोटी के चक्कर में
और से और अधिक पाने की चेष्टा में
एक बेचैनी है, लालसाएं हैं जो
मरीचिका की तरह इंसान को फंसा रही है
और वह दौड़ रहा है, दौड़ता जा रहा है
यही दौड़-भाग आज उसकी जिंदगी बन गई है

प्रकृति देख रही है कि यह क्या हो रहा है

सब कुछ बदल गया है, सुकून खत्म हो गया है
ट्रैफिक के शोर में पक्षियों का कलरव खो गया है
केवल वाहन दौड़ रहे हैं, मनुष्य को अपने गंतव्य तक पहुंचाने के लिये
बदकिस्मती, लेकिन शायद यही आज की जरूरत है

—– कुमुद बोथरा

Image Credit: Dennis Jarvis from Halifax, Canada, CC BY-SA 2.0 <https://creativecommons.org/licenses/by-sa/2.0>, via Wikimedia Commons

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