आनंद का ठिकाना

आनंदमयी आत्मा खुशी ढूँढती है, चलने को तत्पर जहाँ तक भी जाना
आँखो ने देखी जो माया की नगरी, मन ने तड़प के कहा यह है पाना,
बुद्धि कहे आनंद धन-दौलत, ना पाए तू जब तक मिलेगी ना मंज़िल,
बड़ा सा महल ना बनाए तू जब तक, खुशी का मिलेगा ना तुझको ठिकाना

महल भी हो ऐसा बड़ा सबसे वो हो, रुतबा भी ऐसा न जिसका पैमाना
चलूँ मैं जहाँ भी झुकाएँ सर अपना, सम्मान ऐसा ही जीवन में लाना
जो आए मेरे मन उसी वक़्त पाऊँ, मैं पल-पल में, दिन-दिन में बढ़ता ही जाऊं,
ना सिलवट दुखों की, ना आँखों में आँसू, सुखों से फ़क़त मेरा रिश्ता बनाना

घर में सभी, जो कहूँ मैं करे वो, दुश्मन भी मेरे, मुझसे डरे वो,
दोस्तों में घिर के मैं हंस हंस के बोलूं, क्या खुशियों भरा हो यह सारा ज़माना
शामें ढली हैं, है सब कुछ भी पाया , बुद्धि ने कैसा दीवाना बनाया,
मिला जो अभी तक, वो आनंद नहीं है, मैं समझा मगर देर से यह फसाना

“सत्त चित्त आनंद” आनंदमय है, तो खोजूँ उसे क्यूं मैं बन बावरा सा,
भीतर भी आनंद बाहर भी आनंद, इसने मुझे कर दिया है दीवाना.
क्या भीतर ये भीतर लगाया हुआ है, भीतर मुझे कुछ भी दिखता नहीं है,
तो बोला गुरु ना ही भीतर ना बाहर, हैं चारों दिशाओं में गूंजे फसाना

जो दिखने में तुझसे अलग हैं रे बंदे, प्रभु रूप सब में यह कहते सयाने
जो चित तेरे मन में वो चित है सभी में, तू समझे अगर तो यह आनंद जाने,
अगर दे सके तू मुहब्बत वही जो, मुहब्बत तू अपने लिए माँगता है,
तेरी खोज को फिर मिलेगी सफलता, आनंद में परिगीर्ण (engulfed) होगा जहाँ

— डा. रानी कुमार

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