कहत कबीर १४

माटी कहे कुम्हार से , तू क्या रौंदे मोय । // माली आवत देखि कै कलियन करी पुकार ।

कबीरदास जी संत कहे जाते हैं, पर इनके विचारों और रचनाओं का क्षेत्र केवल धर्म, अध्यात्म, चिंतन और भजन नहीं है। उन्होंने सांसारिक जीवन — व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार; समाज की प्रचलित प्रथाओं, व्यवहारों और अंधविश्वासों; समाज में फैले ऊँच-नीच के भाव; जाति प्रथा की बुराइयों; सभी धर्म-संप्रदायों के व्यवहार में आए हुए अंधविश्वासों तथा पाखण्डों आदि — पर भी गहरा विचार किया है और अपनी रचनाओं में उन पर करारी टिप्पणियाँ भी की हैं। उनके मत में ये वे बुराइयाँ हैं जो समाज की सुख-शांति, सेहत और ख़ुशहाली के रास्ते में बाधा पैदा करती हैं कबीरदास जी के दोहों तथा अन्य रचनाओं को सही सही समझ पाने के लिए हमें इन सभी बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

— कुसुम बांठिया

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माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय ।
इक दिन ऐसा आयगा, मैं रूँदूँगी तोय ।।

इंसान जब इस संसार में रहता है, यहाँ के सुखों के साधन जुटाता और उन्हें भोगता है, तब उसे ध्यान भी नहीं आता कि ये सब सुख और इनके साधन ही नहीं, इन्हें भोगनेवाला वह स्वयं भी क्षणभंगुर है । इस बात को कबीरदास कुम्हार और मिट्टी के उदाहरण द्वारा समझाते हैं।
कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को तैयार करता है । उसे खोदकर, पानी डालकर मुलायम करने के लिए वह पाँवों से रौंद – रौंदकर गूँधता है । कबीर इस तरह पाँवों से मिट्टी रौंदने को मनुष्य के अहंकार के प्रतीक के रूप में देखते हैं । अपने सुख साधन जुटाने में वह अपनी असलियत ही भूल जाता है । इस असलियत को कबीर ने मिट्टी से कहलवाया है । मिट्टी मनुष्य से कहती है, अभी तू मुझे पैरों के तले रौंद रहा है पर एक समय ऐसा आनेवाला है जब मैं तुझे रौंदूँगी । अर्थात मरकर तुझे सदा के लिए मेरे अंदर ही दब जाना होगा ।
मनुष्य कितना ही ताकतवर और सत्ताशाली हो, समय आने पर उसे मरकर मिट्टी में ही मिल जाना होता है । यह बात उसे हमेशा याद रखनी चाहिए । कबीर कहना चाहते हैं कि जिन चीजों को मनुष्य जीवन का लक्ष्य मानकर जीता है, वे केवल थोड़े समय के लिए अस्थाई सुख ही दे सकती हैं । उसे याद रखना चाहिए कि वे सुख और उसका जीवन, दोनों ही अस्थाई हैं । उसे यह बात भी याद रखनी चाहिए कि आत्मिक सुख ही स्थायी सुख होता है और उसे इसी सुख को प्राप्त करने की साधना करनी चाहिए ।

माली आवत देखि कै, कलियन करी पुकार ।
फूली फूली चुनि लिए, काल्हि हमारी बार ।।

इस दोहे का शब्दार्थ है, माली को आता देखकर कलियाँ घबराकर कहने लगती हैं – हममें से जो खिलकर फूल बन चुकी हैं उन्हें तो आज यह चुनकर ले जा रहा है ।  कल जब हम खिल जाएँगी तो हमारा भी यही हश्र होगा ।  हमें भी इसी तरह चुनकर अपनी डाली से दूर कर दिया जाएगा ।  इस दोहे के माध्यम से कबीर सांसारिक प्राणियों को उनकी नियति की जानकारी भी दे रहे हैं और चेतावनी भी ।

हम सभी उन कलियों की तरह हैं जो उपवन के वृक्षों – पौधों पर लगी हैं ।  उस सुंदर – सुखद माहौल को ही अपना जीवन मानकर हम ख़ुशी से झूमते रहते हैं ।  हमें ध्यान में भी नहीं आता कि यह स्थिति क्षणभंगुर है ।  मृत्यु वह माली है जो समय आने पर कलियों को चुनकर उपवन से ले जाता है ।  यह नियति सभी कलियों की होती है ।  आगे या पीछे, हर प्राणी को मृत्यु का ग्रास बनना ही पड़ता है ।  इस चेतावनी के द्वारा कबीर प्राणियों को यह समझा रहे हैं कि सांसारिक जीवन के क्षणभंगुर होने का तथ्य हमें भूलना नहीं चाहिए ।  इसीलिए, एक तो हमें संसार के मोह में ज़्यादा लिप्त नहीं होना चाहिए ; और दो, हमें संसार छोड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए ।  साथ ही हमें मृत्यु के बाद मुक्ति पाने की साधना भी करते रहना चाहिए।  (एक और दोहे में भी कबीर ने यही बात कही है, ‘ जगत चबेना काल का, कुछ मुँह में कुछ गोद । ‘संसार काल की झोली में पड़े भुने चने जैसा है ।  झोली में से कुछ चने वह खा चुका है और बाक़ी भी आगे – पीछे खा ही लेगा ।)

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