तोता मैना की कहानी

आपने बॉलीवुड फिल्म “फकीरा” का गाना “तोता मैना की कहानी तो पुरानी, पुरानी हो गयी” सुना ही होगा, लेकिन थोड़ी अलग ये एक नयी कहानी है

राजस्थान प्रदेश के जयपुर जिले में एक छोटा सा गाँव है, बसेडी, जो जयपुर से लगभग ४०कि. मी. दूर है । इस गाँव में लगभग २००० लोग रहते है और अधिकतर लोग खेती-बाड़ी करके अपना निर्वाह करते हैं । इस गाँव के लोग बड़े ही सज्जन और धार्मिक हैं । यह जयपुर शहर से थोड़ी ही दूर है लेकिन शहर की भाग-दौड़, चहल-पहल और अशांति से दूर है। लेकिन किसानों का व्यापार जयपुर के ऊपर निर्भर है । उनकी सारी उपज गाँव से जयपुर ही जाती है और उन्हें अच्छी कमाई हो जाती है । लेकिन गाँव अपने में शांत, शुद्ध और सौहार्द्र से भरपूर था । जब कभी जयपुर से शहर के लोग वहां सैर करने आते, तो उन्हें बड़ा ही अच्छा लगता था क्योंकि वहां उन्हें प्रकृति के दर्शन होते थे, और सुकून से भरा एक विश्राम-जनक और शांत समय बिताने का अवसर मिलता था । इसी गाँव में रामप्रिय कुशवाह नाम का एक किसान रहता था जो अपनी १ हेक्टेयर जमीन में, जो उसने अपने पिता से पाई थी, खेती कर के संतुष्ट था ।

पिछले तीन वर्षों में उसकी खेती में बढ़ावा आया क्योंकि मौसम ने साथ दिया और सरकार की परियोजनाओं से किसानों को लाभ हुआ । थोड़ी रकम जमा हो गयी थी और रामप्रिय ने अपनी झोपड़ी को तोड़ कर पक्का मकान बनवाना आरंभ कर दिया । सबसे पहले घर के चारों तरफ दीवालें और उसके बाद अन्दर का काम लगभग समाप्त हो गया था ।

गाँव के किसान बड़े मेहनती थे और रोज़ सुबह सूर्योदय के तुरंत बाद खेतों में जा कर बड़ी मेहनत से परिश्रम कर सूर्यास्त से थोड़ा पहले अपने घरों में लौटते थे । गाँव के इस वातावरण में कई प्रकार के पशु पक्षी भी थे और बड़े आनंद से चहचहाते हुए किसानों का मन बहलाते थे ।

एक दिन रामप्रिय ने देखा कि उसके घर की मुंडेर पर एक बड़ा ही सुंदर तोता आकर बैठ गया और अपने स्वर में कुछ गा रहा था । तोता बड़ा ही सुन्दर था । उसका शरीर हरे रंग का था लेकिन उसमे कई हरे रंग के ही मिश्रण थे । कहीं पर गहरा हरा कहीं पर हल्का । उसका सिर लाल रंग का था और आंखें गहरे काले रंग की । इसके अतरिक्त, ऊपर पीली और नीचें काले रंग की सुन्दर चोँच के साथ तोता बड़ा ही आकर्षक था । रामप्रिय मंत्र-मुग्ध हो कर उसे देखते ही रह गए । जब होश आया तो उसने अपने बेटे महेश को बुलाया और उसे दूर से दिखाया । महेश भी बहुत ही प्रभावित हुआ और तोते को देखता ही रहा । थोड़ी देर बाद तोता उड़ गया । ये क्रम लगभग पाँच दिनों तक चलता रहा । तोता थोड़ी देर के लिए आता, अपना सुरीला गाना सुनाता और चला जाता । सारे परिवार को ये बहुत पसंद था और सबसे अधिक महेश को । पांच दिनों के बाद जब तोता मुंडेर पर बैठा था, महेश उसके पास गया और अपना हाथ बढ़ा कर उसने तोते को इशारा किया । तोता भी समझ गया और वो उसके हाथ पर आ कर बैठ गया और दोनों आपस में बातें करने लगे । ये क्रम भी दो-तीन दिन तक चला । महेश ने अपने माँ-बाप से प्रार्थना की कि वह तोते को घर में रख कर पालना चाहता है । उसकी बड़ी ज़िद के बाद माँ-बाप ने हाँ की और एक पिंजड़ा लाकर अपने घर में रखा । दूसरे दिन जब तोता आया तो महेश ने उसे पिंजरे में रखा और तोता अपनी स्वीकृति में गाने लगा ।

रामप्रिय हर प्रभात को सूर्योदय से थोड़ा पहले उठ कर नहा-धो कर प्राणायाम और योग करता था और अंत में पांच बार “हरी ॐ तत् सत्” का उच्चारण करके उठता था । नाश्ते के बाद खेतों में काम के लिए जाता था । इस सुबह योग करने के पश्चात जब वो “हरी ॐ तत् सत्” का उच्चारण कर रहा था तो उसने सुना की तोता भी साथ में “हरी ॐ तत् सत्” का उच्चारण कर रहा था । रामप्रिय को यह बहुत ही अच्छा लगा और जब भी कोई घर में “हरी ॐ तत् सत्” बोलता, तोता हमेशा दोहराता था । साँझ को भी जब रामप्रिय घर आकर हाथ-मुंह धोने के बाद मन्त्रों का उच्चारण करता और अंत में पांच बार “हरी ॐ तत् सत्” कहता तो तोते के “हरी ॐ तत् सत्” के उच्चारण से वातावरण बड़ा ही सुरमय हो जाता ।

लगभग दो महीनों के बाद एक दिन जब महेश घर पर अपने माता-पिता के साथ रात के भोजन के समय से बातचीत कर रहा था तो उसने उन्हें बताया की उसने एक पुस्तक में पढ़ा था कि मनुष्य को प्रकृति के जीवों को अपने स्वार्थ के लिए बंदी बनाना उचित नहीं है और उसने अपने एक अध्यापक से वार्तालाप भी किया था । अध्यापक ने गौतम बुद्ध की वो कहानी सुनाई जिसमे उन्होंने बताया कि यदि तुम एक गुलाब के फूल को “पसंद” करते हो तोड़ कर घर ले आते हो, लेकिन यदि तुम “प्रेम” करते हो तो उसे पौधे पर देखकर ही प्रशंसा करोगे और उसका आनंद उठाओगे, प्रकृति की दी हुई सुन्दरता की सराहना करोगे और अधिक समय तक उस फूल को देख पाओगे और प्रकृति के कार्य में बाधा भी नहीं बनोगे। । महेश ने यह निश्चय लिया था की वह तोते को स्वतंत्र कर देगा । महेश इस विषय में उदास तो था लेकिन उसने सोचा की तोते को स्वतंत्रता देने में उसके मन को शांति मिलेगी । महेश के माता-पिता ने भी अपनी सहमति जताई क्योंकि वे भी यही चाहते थे ।

दूसरी सुबह प्रार्थना और “हरी ॐ तत् सत् के पश्चात महेश ने अपने भीगे नेत्रों से आंसू पोंछते हुए पिंजरे का द्वार खोल दिया और तोते को इशारा किया । तोता स्वतंत्र होकर उड़ गया । लेकिन उस सांझ को जब रामप्रिय अपनी प्रार्थना के पश्चात “हरी ॐ तत् सत्” उच्चारण कर रहे थे तो उन्हें तोते की आवाज़ भी सुनाई दी । आश्चर्यचकित हो कर उसने देखा तो निश्चय ही तोता वहां आकर अपनी साँझ की प्रार्थना कर रहा था । यह क्रिया चलती रही और महेश, उसके माता-पिता और तोता सब लोग अत्याधिक प्रसन्न थे ।

एक सुबह लगभग १० बजे रामप्रिय की पत्नी घर का काम कर रही थी तो अचानक उसे बाहर, शोर की आवाज़ आयी । उसने बहार आकर देखा तो आकाश में कई सौ तोते मंडरा रहे थे और एक गोलाकार झुण्ड बना कर गोल आकार में ही उड़ रहे थे । जब ध्यान से रामप्रिय की पत्नी ने सुना तो ये प्रत्यक्ष हुआ के वे सारे तोते “हरी ॐ तत् सत् “ का उच्चारण कर रहे थे और उसने देखा कि एक तोता धरती पर पड़ा हुआ था और लगता था, उसकी मृत्यु हो चुकी है । वास्तव में तोतों का वो झुण्ड उस तोते की मृत्यु का शोक मना रहा था और रामप्रिय के प्रिय तोते ने सबको “हरी ॐ तत् सत्” सिखा दिया था और वे एक साथ मिलकर शोक सभा कर रहे थे । आकाश में उनका उड़ना तब तक चलता रहा जब तक सफाई करने वाले मृत तोते को उठा कर नहीं ले गये ।

एक साँझ को जब रामप्रिय अपने खेतों से लौटने वाला था तो महेश ने देखा कि घर की मुंडेर पर तोते के साथ एक सुन्दर सी मैना भी बैठी थी । वो काले रंग की छोटी सी चिड़िया थी और उसके पैर, चोंच और आँखों के घेराव पीले रंग के थे । ये काले और पीले रंग का मिश्रण बड़ा मोहक था । तोता और मैना अपनी अपनी मधुर चहचहाहट में बोल रहे थे । जब रामप्रिय घर लौटा तो उसने भी ये दृश्य देखा और मुस्करा पड़ा की तोते को एक साथी मिल गया है ।

उस दिन, रामप्रिय ने अपनी प्रार्थना समाप्त की और “हरी ॐ तत् सत्” का उच्चारण कर रहा था तो उसे दो और स्वर सुनाई दिए, तोते के साथ मैना भी “ॐ तत् सत्” का उच्चारण कर रही थी । महेश और उसकी माँ भी बड़े आश्चर्चकित और प्रभावित हुए । उस दिन के पश्चात प्रतिदिन प्रभात और साँझ को जब रामप्रिय प्रार्थना के पश्चात “हरी ॐ तत् सत्” उच्चारता तो सारा परिवार–उसकी पत्नी, महेश, तोता और मैना सारा झुण्ड मिलकर दिन का स्वागत और अंत करते । इससे उनके ह्रदय को अत्यधिक शांति मिलती ।
तोता और मैना प्रतिदिन समय पर और आते और “हरी ॐ तत् सत्” उच्चारण करने के पश्चात उड़ जाते,मानो कि उनका दिन भर का जिवोदेष्य पूर्ण हो गया । ये नियम अब तो कितने वर्षों से चल रह है कि किसी को स्मृति भी नहीं ।

“ॐ तत् सत्” का अर्थ – श्रीमद भागवद गीता के अनुसार किसी भी धार्मिक कर्म का प्रारंभ “ॐ” के उच्चारण से होता है । ”तत्” का अर्थ है कि साधक को अपने कर्म और त्याग के लिए फल की अपेक्षा कभी नहीं करनी चाहिए । “सत्” तो सत्य ही है, यह प्रतीक है पवित्रता का और केवल एक ही सत्य है—ब्रह्म । ॐ तत् सत् के कई और भी अर्थ और व्याख्यान आपने शायद सुने हों—लेकिन “ॐ”, “त्याग” और “सत्य” सब में सम्मिलित हैं ।

— राम बजाज

Image credit: https://www.flickr.com/photos/13070711@N03/13094487403
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