कहत कबीर २५

तेरे दिल में राम है, ताहि न देखा जाय । ///// सुख के माथे सिल परै, नाम हृदय ते जाय ।

कबीर संत कहे जाते हैं, पर इनके विचारों और रचनाओं का क्षेत्र केवल धर्म, अध्यात्म, चिंतन और भजन नहीं है। उन्होंने सांसारिक जीवन — व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार; समाज की प्रचलित प्रथाओं, व्यवहारों और अंधविश्वासों; समाज में फैले ऊँच-नीच के भाव; जाति प्रथा की बुराइयों; सभी धर्म-संप्रदायों के व्यवहार में आए हुए अंधविश्वासों तथा पाखण्डों आदि — पर भी गहरा विचार किया है और अपनी रचनाओं में उन पर करारी टिप्पणियाँ भी की हैं। उनके मत में ये वे बुराइयाँ हैं जो समाज की सुख-शांति, सेहत और ख़ुशहाली के रास्ते में बाधा पैदा करती हैं कबीर के दोहों तथा अन्य रचनाओं को सही सही समझ पाने के लिए हमें इन सभी बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

— कुसुम बांठिया

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तेरे दिल में राम है, ताहि न देखा जाय ।
दिल देहुरा के खबर नहिं, पत्थर ते कह पाय ।।

इस दोहे में भी कबीरदास जी इसी बात पर बल देते हैं कि परमात्मा का निवास पत्थर की मूरत या मंदिर में नहीं, मनुष्य के हृदय में होता है । वे मनुष्य से कहते हैं, ‘राम (अर्थात ब्रह्म) तो तेरे दिल के अंदर बसे हैं, उनकी ओर तेरा ध्यान जाता ही नहीं । असली मंदिर तेरा मन ही है जिसका तुझे भान ही नहीं है । बाहरी जगत में पत्थर के मंदिर और देवता से तुझे कुछ भी मिलने वाला नहीं है । कबीरदास जी मानते हैं कि बाहरी जगत वैसे भी माया का उपजाया हुआ भ्रम है । ईश्वर तत्व की प्राप्ति के लिए मनुष्य को बाहर न भटक कर अपने अंतर में ही उसकी साधना करनी चाहिए ।
कबीरदास जी नेइस दोहे में भी निराकार ईश्वर (ब्रह्मन) को “राम” के नाम से संबोधित किया है ।

सुख के माथे सिल परै, नाम हृदय ते जाय ।
बलिहारी व दुक्ख की, पल पल नाम रटाय ।।

जैसा कि कबीरदास जी एक अन्य दोहे में कह चुके हैं — ‘ दुःख में सुमिरन सब करे , सुख में करे न कोय’ , अर्थात मनुष्य को ईश्वर की याद तभी आती है जब उस पर किसी दुःख या विपत्ति का हमला होता है जिससे उबरने के लिए उसे ईश्वर की सहायता की ज़रूरत होती है । सुख के समय तो वह आनंद के भोग में मग्न रहता है । इस दोहे में वे सुख के माथे पर पत्थर पड़ने अर्थात उसके सर्वनाश की कामना करते हैं क्यों कि उसकी वजह से हम भगवान का नाम लेना भूल जाते हैं । दुःख के प्रति वे बहुत कृतज्ञ हैं क्योंकि उसकी वजह से हम हर पल ईश्वर को याद करते रहते हैं ।

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