मुंबई महानगर में, मुलुंड की एक चॉल में, एक निम्न-मध्यमवर्गीय (लोअर मिडिल क्लास) परिवार रहता था । परिवार में माँ, पिता, एक बेटी और दो बेटे थे । बेटी सबसे बड़ी थी और उसके भाई उससे ३ और ५ वर्ष छोटे थे । पिता मुंबई में एक छोटी फार्म मरण क्लर्क का काम करते थे और माँ घर संभालती थी । गाँव में उसकी दादा और दादी का छोटा सा खेत था और उसमें वह प्याज उगाते थे, लेकिन उम्र के कारण ज़्यादा काम नहीं कर सकते थे । इसलिए उन्होंने एक आदमी को मदद करने के लिए रख लिया था ।
जीवन ढर्रे पर किसी तरह चल रहा था और लोग अपने-अपने काम में खुश थे और किसी को कोई खास शिकायत नहीं थी । पड़ोस के लोग अच्छे थे, दोस्त अच्छे थे लेकिन अपनी कमाई बढ़ाने की चिंता तो थी ही, जो हर निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार को होती है । बेटी बड़ी हो रही थी । अब तो १८ वर्ष की हो गई थी और माँ-बाप को उसके विवाह की चिंता लगने लगी थी — विशेषकर इसलिए कि निर्मला सच में निर्मल थी और अति-सुन्दर भी । आस-पास के जवान लड़के उसके पीछे-पीछे भागते, छेड़-छाड़ करते, पीठ पीछे सीटी बजाते और बहुत कमेन्ट करते थे । लेकिन निर्मला किसी को भाव नहीं देती और अपने परिवार में अपने माता-पिता और भाइयों में और अपनी पढ़ाई में ध्यान देती थी ।
एक दिन पिता जी ट्रेन से घर आ रहे थे और उनके हाथ में छाता था । उतरते समय हमेशा की तरह मुंबई की ट्रेन की भीड़ में जब वो डब्बे से उतर रहे थे तो उनको पीछे से एक ज़ोर का धक्का लगा । हाथ में छाता था और वो कहीं फंस गया और वह गिर गये । गिरने के बाद भी भीड़ नहीं रुकी और क्योंकि लोग उनके ऊपर भी चढ़ कर चल रहे थे वो तो बेहोश हो गये । जब लोगों ने उन्हे इस हालत में देखा तो पुलिस को बुलाया और पुलिसवाले उन्हें अस्पताल ले गये । लेकिन अस्पताल जाते समय ही एम्बुलेंस में उन्होंने सांस छोड़ दी ।
इस अत्यंत गंभीर घटना के बाद सारा परिवार तहस-नहस हो गया । जहां सुख शांति से सब कुछ चल रहा था, इस एक घटना से सब का सत्यानाश सा हो गया । आर्थिक व्यवस्था भी बड़ी कष्टमय हो गई । जो बची-खुची रकम और गहने जो घर में थे वो भी धीरे-धीरे खत्म होने लगे । पड़ोसियों ने हमदर्दी जतायी लेकिन वो भी कितना कर सकते थे ? दादा-दादी ने अपनी ज़मीन बेचने की सोची लेकिन उन्होंने यह सोच कर कि यह ज़मीन उनका आखिरी सहारा और पोती-पोतों की विरासत है, उन्होंने परिवार की सहायता करने के लिए ज़मीन को छोड़ कर, अपनी सारी बचत और गहने बेच कर सारे पैसे निर्मला के घर भेज दिए । किसी तरह एक साल बीत गया पर उसके बाद वही चिंता, वही गम ।
निर्मला HSC में फर्स्ट क्लास पा कर पास हो गई थी लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि वो कॉलेज की फीस नहीं भर सकती थी । उसने छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया लेकिन इतने लोगों ने, जिनकी हालत निर्मला के परिवार से भी बदतर थी, आवेदन किया था कि उसे छात्रवृत्ति नहीं मिली । कई लोगों ने रिश्वत दे कर प्रवेश ले लिया, लेकिन निर्मला का परिवार इसके बिल्कुल विरोध में था और ना ही उनमें आर्थिक क्षमता थी ।
अंत में निर्मला ने नौकरी के लिए आवेदन किया । करीब सौ जगह आवेदन करने के और १० इंटरव्यू के बाद भी उसे कहीं ढंग की नौकरी नहीं मिली । बेचारी निर्मला बहुत निराश हो गई थी । उसकी माँ भी बहुत ही दुखी थी लेकिन वो भी क्या कर सकती थी । बेचारी खुद ही लोगों के घर बर्तन धोने, सफाई का काम करने और बच्चों की पढ़ाई करने और घर का काम करने के बाद वो भी बहुत थक जाती और प्रार्थना करती कि शायद भाग्य से कुछ अच्छा हो जाए । लेकिन उसकी आशा नहीं थी ।
निर्मला ने सोचा अब तो और कोई चारा नहीं है । मैं भी माँ की तरह बाई बन जाऊँ, साथ में बच्चों को ट्यूशन दूँ और खुद भी पत्राचार से पढ़ूँ । इससे माँ की मदद हो जाएगी और आर्थिक समस्या में थोड़ा सा सुधार होगा ।
एक रात, जब दोनों भाई सो रहे थे, उसने माँ से बात करने की हिम्मत की । माँ ने पहले तो बोला “तुझे ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है । काम चल जाएगा । लेकिन बहुत जिद करने के बाद आखिर में माँ ने बताया कि वो जहां काम करती हैं, उस मैडम की बाई को बच्चा होने वाला है । इसलिए वह छुट्टी पर जाएगी और मैडम को एक बाई की सख्त जरूरत पड़ेगी । मालकिन शायद शायद उसे रख ले ।
दूसरे दिन माँ और बेटी साथ गये और माँ ने उसे काम करने, सफाई करने, कपड़े धोने और खाना बनाने के बारे में सब कुछ दिखाया और हिदायत दी कि मैडम बहुत सख्त है और कभी-कभी उसकी ज्यादती भी करती हैं, उसे सह लेना । क्यों कि उनकी बाई बच्चे के जन्मने के बाद वापस आ सकती है, तुम्हारी नौकरी शायद बहुत दिन नहीं रहे, लेकिन कम से कम काम सीख जाओगी, थोड़ा तजुर्बा हो जाएगा तो किसी और जगह नौकरी कर लेना । निर्मला और माँ दोनों मिल कर मैडम के घर गये । मैडम को बड़ी खुशी हुई कि उसे बिना किसी मुश्किल से बाई मिल गई । उन्होने निर्मला को अगले दिन से काम पर आने के लिए कह दिया । माँ की खुशी का ठिकाना नहीं था और वो निर्मला को लेकर मंदिर में भगवान को धन्यवाद देने के लिए ले गईं ।
दिन बीतते गये और माँ – बेटी की कमाई से घर की हालत थोड़ी सुधर गई । जैसा कि माँ ने बताया था मैडम बहुत सख्त तो थीं, काम में ढील कभी नहीं सहतीं और डांटने में भी पीछे नहीं हटती थीं । लेकिन थीं दयालु और निर्मला को अच्छी लगती थीं ।
लेकिन समय तो कभी नहीं थमता । तीन महीने बीत गये और मैडम की पुरानी बाई वापस आना चाहती थी । मैडम निर्मला को बहुत पसंद करती थीं, लेकिन वो पुरानी बाई को धोखा नहीं देना चाहती थीं । उन्होंने निर्मला को बुरी खबर दी । निर्मला को बहुत दुःख नहीं हुआ क्योंकि उसको पता था कि ऐसा तो होने वाला ही था । उसने मैडम को धन्यवाद दिया । तभी, मैडम बोलीं “रुक जा । मुझे आज ही एक email आई है । मेरे चाचा की बेटी पाँच दिन बाद यहाँ शिफ्ट करने वाली है । उसका पति एक बड़ी कंपनी में आई. टी. ऑफिसर है । उनकी शादी करीब चार साल पहले हुई थी लेकिन उन्हें अभी कोई बच्चा नहीं है । मैं आज ही उससे पूछूंगी । मुझे पक्का विश्वास है कि उनको मदद की जरूरत होगी और बाई की जरूरत तो होगी ही । तू उनको शिफ्ट करने में भी मदद कर सकती है ।
दूसरे दिन मैडम ने निर्मला को फोन किया कि मैडम की सहेली आशा तो बहुत ही खुश थी कि उसे बैठे-बिठाए एक अच्छी बाई मिल गई । आशा का पति विनय भी बहुत खुश था और क्या-क्या सोच रहा था । उसे आशा ने बता दिया था कि निर्मला बहुत सुन्दर है और केवल २० साल की है ।
विनय बड़ा ही मस्त-मौला, मनचला, दिल-फेंक, हंसी-मज़ाक करनेवाला, इश्क लड़ाने वाला पुरुष था । उसकी कमजोरी थी तो वो थी औरतें और लड़कियां । वो उनसे हंसी-मज़ाक और इश्कबाजी में माहिर था । आशा को यह सब पसंद तो नहीं था पर वो सह लेती थी — इसलिए भी की विनय बहुत खूबसूरत होने के साथ बड़ा चतुर भी था और बहुत कमाता था । उसकी नई नौकरी एक बड़ा प्रमोशन थी । वो आई. टी. सेल्स में था इसलिए शहर में ही काफी ग्राहकों से मिलन पड़ता था । उसे समय पर आना जाना अच्छा नहीं लगता था और जब चाहे तब काम पर जाना या नहीं जाना भाता था । आशा भी काम करती थी, लेकिन ९-५ तक ।
आशा और विनय मुंबई में आए और निर्मला से मिले । आशा को निर्मला का निर्मल व्यवहार बहुत पसंद आया और विनय की तो चांदी हो गई । निर्मला का गोरा रंग-रूप, उसकी आंखें और उन्नत उरोज़, उसके शरीर और व्यक्तित्व देखते ही उसे तो नशा आ गया और उसने सीटी बजा दी, लेकिन फिर दोनों से माफी मांगी । वो मन ही मन क्या सोच रहा था, उसका तो सिर्फ उसे ही पता था ।
निर्मला ने आशा और विनय को बताया कि वह उनके घर काम करने के लिए सुबह आएगी और ब्रेक्फास्ट के बाद बर्तन धो कर फिर तीन बजे से पाँच तक सफाई करने और खाना बनाने आया करेगी । बीच में उसे एक और घर में काम और अपनी पढ़ाई करनी है । आशा और विनय को सब ठीक लगा और उन्होंने ५००० रू पेशगी में दिए और बोले कि उसकी महीने की तनख़्वाह होगी ८००० रू । निर्मला को सब अच्छा लगा और उसने खुशी-खुशी हाँ बोला और भागी-भागी अपनी माँ के पास गई । माँ भी बहुत खुश थी कि बिना मुश्किल के उसे जल्द ही नौकरी मिल गई और अब दो नौकरियों में निर्मला करीब १२००० रू लाएगी और इससे घर आर्थिक स्थिति सुधार जाएगी ।
निर्मला को आशा और विनय के घर में काम करना बहुत पसंद आया और उनको भी उसका काम बहुत अच्छा लगा । खास कर विनय को । उसे निर्मला को सुबह-शाम देखना बहुत भाता था । वह उससे रोज बातें करना चाहता था लेकिन निर्मला बहुत शर्माती थी । उसे पता था कि विनय उसे छुप-छुप कर देखता है । उसके काम करते समय उसकी नजर निर्मला पर ही होती है । निर्मला बहुत शिष्ट कपड़े पहनती थी, आँचल संभाल के रखती थी और घूँघट तो नहीं रखती लेकिन अपने शरीर को ढक के रखती थी । उधर विनय बिना कुछ कहे ही उसे देखता । कभी-कभी उसे अकस्मात छूने की कोशिश भी करता । निर्मल को पता लग गया था कि वह उसे देखता ही रहता था । कभी-कभी वो दूर से घूर-घूर कर मन ही मन उसके रूप की प्रशंसा करता ।
विनय दोपहर को भी ३ और ५ के बीच, जब निर्मला काम कर रही होती, अचानक आ जाता था — इस बहाने कि उसे किसी कागज़ की सख्त जरूरत थी । निर्मला उस समय झाड़ू लगाती थी और विनय को उसे देखना बहुत पसंद करता था । फिर वह, थोड़ी देर में, बिना कुछ बोले चला जाता । निर्मला बेचारी कुछ कह भी नहीं सकती थी — आखिर वह उसका मालिक था । वह बस अपने काम में लगी रहती और फिर ५ बजे अपने घर चली जाती ।
थोड़े दिन ऐसे ही चलता रहा । निर्मला अपना काम करती, विमल भी ब्रेक्फास्ट के समय आशा के सामने उससे कुछ बात करने की कोशिश करता, लेकिन मज़ाक करता तो निर्मला कोई जवाब नहीं देती । दोपहर को भी वह एक घंटे के लिए आ जाता, उसे देखता, कुछ काम कर के वापस चला जाता ।
निर्मला थोड़े सोच में पड़ गई कि विमल की आदतों से वो कैसे बचे । उसने अपनी माँ को भी इस बारे में कुछ नहीं बताया । उसके दिमाग में ये खयाल आया था कि वो मैडम से बात करे, लेकिन थोड़ा सोचने के बाद उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उसको पता नहीं था कि वह इस बात को कैसे लेंगी और वह पति-पत्नी के बीच में झगड़े का कारण नहीं बना चाहती थी । उसे मैडम बहुत पसंद थीं और मैडम भी उसे पसंद करती थी । निर्मला के मन में दिन भर उथल-पुथल मची रहती थी ।
निर्मला बहुत सोच में पड़ी थी कि एक दिन उसके दिमाग में एक बहुत ही अजीब ख़याल आया । वो बहुत उत्साहित हो गई और उसने सोचा मैडम से बात की जाए, लेकिन कैसे । बहुत ही सोचने के बाद उसने निश्चय किया कि इस बात को खुली तरह से बात नहीं करेगी लेकिन उनसे मदद लेगी ।
उसने यह भी सोचा कि इस अजीब से विचार से कहीं मैडम को बुरा तो नहीं लगेगा, लेकिन उसने उस खयाल को मन से निकाल दिया और सोचा देखा जाएगा क्या होता है । उसे विश्वास था कि मैडम उस पर बहुत नाराज़ नहीं होंगी । अगर हुईं भी तो वो उसके परिणाम के लिए अपने को तैयार थी ।
जिस दिन निर्मला अपने विचार को सच में बदलना चाहती थी उसके एक रात पहले उसने मैडम को फोन किया और पूछा कि क्या वह सुबह नाश्ते के समय दस मिनट जल्दी आ सकती है? मैडम ने हाँ कर दी ।
दूसरे दिन सुबह उठ कर उसने एक थाली बनाई जिसमें एक दिया, कुम-कुम और थोड़ी मिठाई और एक सुन्दर सी अपने हाथ से बनाई हुई “राखी” रखी ।
सुबह जब वह आशा और विमल के घर गई तो थाली को छुपा के रखा । उनके नाश्ते के बाद जब दोनों जाने को तैयार थे उसने मैडम को बुलाया “मैडम एक मिनट के लिए इधर आइए और प्लीज़ आप विनय का दाहिना हाथ पकड़िए” इस बीच उसने थाली से राखी उठाई और विनय को “राखी” बांध दी ।
अब तो जैसे एक भूकंप आ गया । विनय ने निर्मला को गले से लगा फूट-फूट कर रोने लगा और उसने विमला के पैर छुए । निर्मला ने उसे ऊपर उठाया और मिठाई खिलायी और बोली “विनय भैय्या — इस राखी के बंधन को हमेशा निभाना और इसकी लाज रखना ।”
इस घटना के एक छोटे से धागे ने जो चमत्कार किया उसका व्याख्यान करने के शब्द इस दुनिया में किसी लेखक के पास तो नहीं हैं, यह तो निश्चय है ।
सम्पूर्ण परिवार खुशी से झूम उठा । विनय को एक अति-सुन्दर संस्कारोंवाली बहन मिल गई जो उसे बचपन से नहीं मिली थी और जिसको वो हर राखी के दिन बहुत ही “मिस” करता था, और निर्मला को एक और भाई मिल गया । मैडम भी बहुत ही खुश हुईं और माँ ने जब यह सुना तो निर्मला और विनय के झोले आशीर्वादों से भर दिए ।
— राम बजाज

