कहत कबीर ०९

ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय । // करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय ।

कबीरदास जी संत कहे जाते हैं, पर इनके विचारों और रचनाओं का क्षेत्र केवल धर्म, अध्यात्म, चिंतन और भजन नहीं है। उन्होंने सांसारिक जीवन — व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार; समाज की प्रचलित प्रथाओं, व्यवहारों और अंधविश्वासों; समाज में फैले ऊँच-नीच के भाव; जाति प्रथा की बुराइयों; सभी धर्म-संप्रदायों के व्यवहार में आए हुए अंधविश्वासों तथा पाखण्डों आदि — पर भी गहरा विचार किया है और अपनी रचनाओं में उन पर करारी टिप्पणियाँ भी की हैं। उनके मत में ये वे बुराइयाँ हैं जो समाज की सुख-शांति, सेहत और ख़ुशहाली के रास्ते में बाधा पैदा करती हैं कबीरदास जी के दोहों तथा अन्य रचनाओं को सही सही समझ पाने के लिए हमें इन सभी बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

— कुसुम बांठिया

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ऊँचे कुल में जामिया, करनी ऊँच न होय ।
सौरन कलश सुरा भरी, साधू निंदा सोय ।।

कबीरदास जी मनुष्य और मनुष्य के बीच जाति,धर्म या कुल आदि के आधार पर किसी भी प्रकार के भेद या ऊँच – नीच को स्वीकार नहीं करते थे । समाज में ऊँचे कुल के व्यक्तियों को श्रेष्ठ और आदर का पात्र माना जाता था । कबीर मानते थे कि आदर व्यक्ति का नहीं, उसके गुणों का होना चाहिए । ऊँचे कुल में जन्म लेने से ही किसी में ऊँचे गुण नहीं आ जाते । सोने के कलश में यदि शराब भरी हो तो वह पीने योग्य वस्तु नहीं बन जाती । सज्जन और समझदार व्यक्ति उसकी निंदा ही करेंगे । मनुष्य का जन्म किसी भी और कैसे भी कुल में हुआ हो, वह आदर का पात्र तभी माना जाना चाहिए जब उसकी ‘करनी’ — उसके कार्य और व्यवहार आदर के योग्य हों ।

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय ।
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ ते खाय ।।

यह कबीरदास जी का एक नीतिपरक दोहा है जिसमें मनुष्य को अच्छा आचरण करने की सलाह दी गई है । व्यक्ति जब किसी भी संकट या विपत्ति में पड़ता है, वह अपने भाग्य को कोसने लगता है या दूसरे व्यक्तियों और परिस्थितियों को उसका जिम्मेवार मानने लगता है । पर वास्तव में होता यह है कि उस स्थिति का कारण उसकी ही कोई गतिविधि होती है — चाहे अज्ञान के कारण, लापरवाही के कारण या ज़िद के कारण । संसार का नियम है कि जिस तरह का बीज बोया जाता है, उसी तरह का फल मिलता है; जिस तरह का कार्य किया जाता है उसी के हिसाब से परिणाम मिलता है । इसी को दृष्टि में रखते हुए कबीरदास पछताने वाले व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहते हैं: तूने मनमाने ढंग से वह कार्य किया जो उचित नहीं था । तुझे वह करना ही नहीं चाहिए था । अब उसी ग़लत काम का कष्टकर परिणाम मिल रहा है तो तू परेशान हो रहा है । जिस प्रकार बबूल का पेड़ लगाने वाले को बबूल के काँटे ही मिलते हैं, मीठे आम नहीं; उसी प्रकार बुरे काम करने का परिणाम अच्छा नहीं हो सकता । आम पाने के लिए आम की गुठली ही रोपनी पड़ती है । उसी प्रकार अच्छा परिणाम पाने के लिए काम भी उचित और अच्छा ही करना चाहिए ।

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