प्यार और प्याज
प्यार और प्याज में बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं होता,
प्यार हो या प्याज, दोनों ही बेशकीमती हैं,
दोनों परत-दर-परत खुलते हैं,
फिर भी कभी पूरे नहीं होते।
दोनों आँखों में आँसू लाते हैं,
कभी चुपचाप, कभी बेइंतहा रुला कर
दोनों को सँवरने के लिए
पहले आग में तपना पड़ता है
इनका रूप हमेशा ख़ुशनुमा हो,
यह ज़रूरी नहीं,
मगर जो सुकून दोनों देते हैं,
वह सचमुच लाजवाब है।
बताओ, प्यार और प्याज के बिना भला कैसे रहा जाए?
ज़िंदगी के स्वाद में दोनों ही तो ज़रूरी हैं।
— राम बजाज


