मनुष्यों के अस्तित्व के लिए पानी आवश्यक है । इसलिए, जैसे-जैसे मानव जाति खानाबदोश “शिकार-संग्रह” जीवन शैली से “कृषिवाद” तक आगे बढ़ी, उन्होंने एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना छोड़ दिया और अपने खेतों के पास बस गए । खेतों और लोगों दोनों के लिए पानी की आवश्यकता के कारण अधिकांश सभ्यताएं नदियों के तट पर विकसित हुईं। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, नदियों से बस्तियों की दूरी भी बढ़ती गई । ऐसे में, झील और तालाब, जिनमें बारिश का पानी को इकट्ठा हो जाता था, पानी का स्रोत बने । जैसे-जैसे आबादी और बढ़ी, लोगों को नदी से दूर, अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्र में जाना पड़ा । वहाँ पानी के लिए भूजल तक पहुंचने के लिए कुएं खोदे जाते थे । । इस खुदी जगह में बारिश के साथ-साथ उस गहराई का भूजल भी एकत्र होता है । जहाँ भूजल का स्तर इतना गहरा हो जाता था कि कुएं से रस्सी के द्वारा पानी नहीं खींचा जा सके, वहाँ एक लंबाई मे गहरी खुदाई की जाती थी ऐसे में, पानी, जमीन से, काफी गहराई में होने के कारण वहाँ तक पहुँचने के सीधी सीढ़ियाँ या सीढ़ियों के तरह तरह के संजाल बनाए जाते थे ।

दुनिया में, इस तरह के कुएं भारत में ही नहीं और देशों की प्राचीन सभ्यताओं, जो अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्र में विकसित हुईं, के अवशेषों में भी मिलते हैं । इन में से पाकिस्तान, अफगानिस्तान ईरान, मिस्र आदि उल्लेखनीय हैं । भारत में ऐसे कई कुएं, जिन्हें यहाँ बावड़ी, या वाव (अंग्रेजी मे stepwell) के नाम से जाना जाता है, गुजरात, राजस्थान और दिल्ली राज्यों में देखे जा सकते हैं । दूसरे देशों में बनी बावड़ियों की तुलना में भारत में बनी बावड़ियाँ कई गुना भव्य और शानदार हैं । जहां दूसरे देशों में बावड़ियाँ केवल जल प्रबंधन के लिए बनी थीं, भारत में बनी बावड़ियाँ वास्तु कला (architecture), प्रारूप (engineering) और पत्थर पर नक्काशी का भी अद्भुत नमूना, और उस समय के भारत की इन कौशलों में प्रवीणता का प्रमाण हैं ।इस तरह के कुएं दुनिया भर में काफी सभ्यताओं में पाये जाते हैं । उत्तर-पश्चिम भारत (गुजरात, राजस्थान और दिल्ली राज्य), और आधुनिक दिनों के पाकिस्तान में, जो अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्र है, ऐसे कई कुएं मइले हैं । इनमें से कई कुओं में, जिन्हें बावड़ी, या वाव (अंग्रेजी मे Stepwell) के नाम से जाना जाता है, गहराई में जाने के लिए, अलग-अलग कुओं मे अलग-अलग जटिल स्वरूप की सीढ़ियाँ बनाई और उन सीढ़ियों को सहारा देनेवाला ढांचे बनाए गए हैं । समग्र संरचना वास्तुकला, इंजीनियरिंग और नक्काशीदार पत्थर के काम की चमत्कारिक मिसाल हैं
— विनोद बाँठिया
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