कबीर और “प्रेम”

कबीर के दर्शन में “प्रेम” की अवधारणा (Concept)

कबीरदास जी ने प्रेम संबंधी भी कई दोहे रचे हैं किंतु उनका अर्थ समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि ‘प्रेम’ से उनका आशय क्या है । कबीरदास जी के दोहों का ‘प्रेम’ सांसारिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक भाव से जुड़ा है । वे ब्रह्म और जीव (जीवात्मा), परमात्मा और आत्मा को प्रेमी और प्रेमिका के रूप में देखते हैं ।
कबीरदास जी की मान्यता है कि सम्पूर्ण विश्व में, ब्रह्मांड में केवल एक ही तत्व है – उसे ब्रह्म कहें या परम सत्य, ज्ञान या यथार्थ । बाक़ी सब माया का खड़ा किया हुआ भ्रम है । संसार के तमाम प्राणी भी उस भ्रम के कारण ही अपने को ब्रह्म से अलग मानते हैं । जिस प्रकार जल के अंदर डूबे हुए घड़े में भी वही जल है जो बाहर है, पर घड़े के आवरण के कारण दोनों अलग लगते हैं, उसी तरह जीवात्मा को बहकाने के लिए माया जो भ्रम खड़े करती है उनकी वजह से जीवात्मा अपने को ब्रह्म से भिन्न एक स्वतंत्र अस्तित्व मानने लगती है ।
सद्गुरु सही मार्ग दिखलाते हैं तो मनुष्य इस सच्चाई को तो समझ जाता है कि वह ब्रह्म का ही अंश है पर अंदर से वह इस अभिन्नता को – ‘मैं स्वयं ही ब्रह्म हूँ ‘ इस भाव को महसूस नहीं कर पाता । फिर भी ब्रह्म में मिलकर एक हो जाने की तड़प उसमें उसी तरह जाग जाती है जैसे पत्नी या प्रेमिका में पति या प्रेमी से मिलने की आकांक्षा । कबीर कहते भी हैं — “हरि मोर पिउ मैं हरि की बहुरिया” (ईश्वर मेरे पति हैं और मैं उनकी पत्नी) । ईश्वर या ब्रह्म से जा मिलने की यह आकांक्षा ही वह प्रेम है जिसका उल्लेख कबीर अपने दोहों में करते हैं ।
सच्ची आकांक्षा के बावज़ूद ब्रह्म से मिल पाना सरल नहीं है । इसके लिए कठोर साधना करनी पड़ती है; माया के फैलाए आकर्षक फंदों से बचकर संसार की व्यर्थता को समझना पड़ता है; अपने स्वतंत्र अस्तित्व के भाव को, अपने अहं को, नष्ट करना पड़ता है और अपने तन, मन और कर्म को पूरी तरह अपने प्रेम की साधना को समर्पित करना पड़ता है । कबीरदास जी ने कहा भी है – “यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं ।”
प्रेम की तीव्रता और मिलन न हो पाने के कारण आत्मा विरह की अवस्था से गुजरती है । मिलन न हो पाने की स्थिति को विरह कहते हैं । इस स्थिति में मन की तीव्र छटपटाहट उसे मरण जैसा कष्ट देती है । फिर भी कबीर उसे बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि इस छटपटाहट के कारण ही वह मिलन की चेष्टा भी जी जान से करती है । इसीलिए कबीर कहते हैं – “बिरहा बिरहा मत कहो …” (यह मत कहो कि विरह न रहे …)। यह चेष्टा ही वह साधना या तपस्या है जो साधक को अज्ञान से निकाल कर परम ज्ञान तक ले जाती है । यह साधना बहुत ही कठिन है, जैसा पहले कहा जा चुका है ।
अंत में, अज्ञान का घूँघट हट जाता है और जीवात्मा रूपी प्रेमिका का ‘प्रिय’ से मिलन हो जाता है – “घूँघट का पट खोल, तोहे पीव मिलेंगे” । जीवात्मा परमात्मा में विलीन होकर उससे एकाकार हो जाती है । अज्ञान से परम ज्ञान की इस यात्रा को कबीर ने प्रेम के रूपक से समझाया है क्योंकि दोनों में ही मिलन की प्रबल चाहना और तन, मन, भाव, विचार और बुद्धि के पूरे समर्पण की ज़रूरत होती है ।

— कुसुम बांठिया

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