ज्यों तिरिया पीहर बसै, सुरति रहै मन माँहि । ///// छिनहि चढ़ै छिन ऊतरै, सो तो प्रेम न होय ।
कबीरदासजी संत कहे जाते हैं, पर इनके विचारों और रचनाओं का क्षेत्र केवल धर्म, अध्यात्म, चिंतन और भजन नहीं है। उन्होंने सांसारिक जीवन — व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार; समाज की प्रचलित प्रथाओं, व्यवहारों और अंधविश्वासों; समाज में फैले ऊँच-नीच के भाव; जाति प्रथा की बुराइयों; सभी धर्म-संप्रदायों के व्यवहार में आए हुए अंधविश्वासों तथा पाखण्डों आदि — पर भी गहरा विचार किया है और अपनी रचनाओं में उन पर करारी टिप्पणियाँ भी की हैं। उनके मत में ये वे बुराइयाँ हैं जो समाज की सुख-शांति, सेहत और ख़ुशहाली के रास्ते में बाधा पैदा करती हैं कबीरदास जी के दोहों तथा अन्य रचनाओं को सही सही समझ पाने के लिए हमें इन सभी बातों को ध्यान में रखना चाहिए।
— कुसुम बांठिया
ज्यों तिरिया पीहर बसै, सुरति रहै मन माँहि ।
ऐसे जन जग में रहैं, हरि को भूलें नाहिं ।।
कबीरदास जी सामान्य उदाहरणों से बड़ी गहरी बात कह जाते हैं । इस दोहे में उन्होंने पीहर (पिता के घर) आई हुई विवाहिता स्त्री के माध्यम से मानव (भक्त) और परमात्मा के संबंध पर प्रकाश डाला है । वे कहते हैं, (पति से गहरा प्रेम करनेवाली) कोई स्त्री पति को पीछे छोड़कर पीहर आने पर भी उसे भूलती नहीं । पति की याद उसके मन में बराबर बनी रहती है । उसी प्रकार मानव आत्मा को भी इस पृथ्वी पर आकर भी ब्रह्म का ध्यान मन में बराबर बनाए रखना चाहिए ।

छिनहि चढ़ै छिन ऊतरै, सो तो प्रेम न होय ।
अघट प्रेम पिंजर बसै, प्रेम कहावै सोय ।।
इस दोहे में कबीरदास जी प्रेम का वास्तविक और गहरा अर्थ समझा रहे हैं । उनके अनुसार प्रेम एक स्थायी भावना है । मन में आता जाता रहने वाला भाव प्रेम नहीं कहला सकता । प्रेम ऐसा अटल भाव है जो हृदय के पिंजर में सदा वास करता रहे और जिसकी मात्रा कभी भी कम न हो ।
यह विशेषता सांसारिक प्रेम पर भी लागू होती है पर कबीरदास जी यहाँ आध्यात्मिक प्रेम की बात कर रहे हैं जो आत्मा का परमात्मा के प्रति या जीव का ब्रह्म के प्रति होता है ।

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